Thursday, 4 July 2013

डा.मासूम रज़ा राही

उठ्ठी  है  साख  अपनी  वहशत  में  घाटे  से
अब   सौदा  कैसे  हो  बेहिस  सन्नाटे  से
सुबहों  का  सूनापन  कहना  कब  मानेगा
शामों  की  वहशत  कब  बंटती  है  बांटे  से
उठिए  तो  पांवों  में  सायों  की    जंजीरें
बैठें  तो  चुभते हैं  तलवों  में  कांटे    से .

.......मासूम रज़ा राही .........

(उनकी ग़ज़ल के कुछ  अशआर )

डा.मासूम रज़ा 'राही'

जीना भी इक मुश्किल फन है सबके बस की बात नहीं
कुछ  तूफ़ान जमीं  से हारे कुछ  कतरे  तूफ़ान  हुये
अपना  हाल  न  देखें  कैसे  सहरा  भी  आईना  है
नाहक  हमने  घर को छोड़ा  नाहक हम  हैरान  हुये
दिल की बर्बादी से ज्यादा हमको है इस बात का गम
तुमने  वो  घर लूटा  कैसे जिस घर के मेहमान हुये
कितना  बेबस कर  देती हैं शोहरत  की जंजीरें  भी
अब  जो चाहे बात  बना ले हम  इतने आसान हुये
            ----डा. मासूम रज़ा राही -----

 गाजीपुर के गंगौली गांव में  १९२७ में जन्मे मासूम रज़ा राही सहज एवं सरल भाषा में दिल को छूनेवाली बात कहने में माहिर थे .वह कवि एवं लेखक होने के साथ-साथ एक संवेदनशील चिन्तक भी थे.उनका उपन्यास ‘आधा गांव’ देश के विभाजन की त्रासदी को उजागर करते हुये यह भी दर्शाता है कि समाज में आपसी स्नेह,सम्मान एवं सामंजस्य का जो सदियों पुराना ताना-बाना था वह कैसे छिन्न-भिन्न हो गया और उसका स्थान साम्प्रदायिकता ने ले लिया.उन्होंने उर्दू तथा हिंदी में कवितायेँ,कहानियां एवं उपन्यास लिखे.उन्होंने फिल्मों में भी गीत,कहानियां एवं संवाद लिखे.भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी गहन रूचि इसी बात से स्पष्ट हो जाती है कि प्रसिद्ध टी.वी. सीरियल महाभारत के संवाद उन्होंने लिखे थे. यद्यपि वर्ष १९९२ में वह हमें छोड़ गए किन्तु अपनी रचनाओं के द्वारा वह सदा हमारे बीच रहेंगे.