डा.मासूम रज़ा राही
उठ्ठी है साख अपनी वहशत में घाटे से
अब सौदा कैसे हो बेहिस सन्नाटे से
सुबहों का सूनापन कहना कब मानेगा
शामों की वहशत कब बंटती है बांटे से
उठिए तो पांवों में सायों की जंजीरें
बैठें तो चुभते हैं तलवों में कांटे से .
.......मासूम रज़ा राही .........
(उनकी ग़ज़ल के कुछ अशआर )
अब सौदा कैसे हो बेहिस सन्नाटे से
सुबहों का सूनापन कहना कब मानेगा
शामों की वहशत कब बंटती है बांटे से
उठिए तो पांवों में सायों की जंजीरें
बैठें तो चुभते हैं तलवों में कांटे से .
.......मासूम रज़ा राही .........
(उनकी ग़ज़ल के कुछ अशआर )

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