Neeraj ki ek Ghazal
खिड़की खुली है गालिबन उनके मकान की
खुश्बू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की
हारे हुए परिंदे जरा उड़
के देख ले
आ जायेगी जमीन पे छत आसमान की
बुझ जाए सरे –आम ही जैसे कोई चराग
कुछ यूँ है शुरूआत मेरे दास्तान की
ज्यूँ लूट लें कहार ही दुल्हन की
पालकी
हालत यही है आजकल हिन्दोस्तान की
ज़ुल्फों के पेचो-ख़म में उसे मत तलाशिये
ये शायरी जुबां है किसी बेजुबान
की
------नीरज ----------
