वह तो उल्लास है
आलोक है
उमंग
है
वह कुछ नहीं कहता
बस ....
मेरे सपनों से निकलकर
आता है और
बैठ जाता है मेरी गोद में
चांदनी की तरह
सुबह की धूप सा
खुशबूओं के समंदर सा
पुष्प सा , वसंत सा
रम जाता है
मेरी पोर – पोर में
प्राण की तरह
आत्मा की तरह
स्पंदन की तरह |
निहारता है मुझे
अपनी निष्कलुष आँखों से
एकटक ......
छूकर मुझे
बाँध लेता है वह
अपनी नन्ही मुठ्ठी में |
वह कुछ नहीं कहता
वह तो दृष्टि है
द्रष्टा है
दृश्य
है
बस ....
मेरी उंगली थामकर
खड़ा हो जाता है
डगमगाता है
मुस्कुराता है
नन्हे पग धरता है
उड़ने को आतुर
पाखी सा ....
थोड़ी दूर जाता है
‘यह जूता तो बहुत तेज चलता
है’
वह अपना अनुभव बताता है
चीनी का दाना मुँह में
चुभलाकर
‘हा माँ चीनी तो मीठी होती
है’
चिल्लाता है ...
‘तुम मत छूना उसे माँ
मोमबत्ती से हाथ जल जाता है’|
वह तो कुतूहल है
वेग
है
विचार है
वह कुछ नहीं कहता
बस ..
नचिकेता की तरह पूछता है प्रश्न
भेद देता है अपनी निश्छल आँखों
से
सभी बंद ---
उड़ता फिरता है
हवा की तरह
कनकौवे की तरह
मुठ्ठी में बांधता फिरता है
रेत,पानी ,हवा ,और प्रकाश
हैरान होकर बताता है---
चाँद सूरज के रास्ते में
आता है
तो सूर्य –ग्रहण हो जाता है
हर चीज बनी है
अणु से, परमाणु से...
पर माँ जहाँ कहती है
वहाँ सर झुकाता है
पिता की बात
संशय होने पर भी
मान जाता है |
वह तो प्रकाश है
शक्ति है
संबल है
कुछ नहीं कहता वह
सावनी प्रश्नों को रोक
लेता है
मन में ही
कभी नहीं कहता वह
‘माँ वहाँ मैं अकेला था’
कभी नहीं कहता
‘आपने अपनी ऊँगली मेरे
हाथों से
क्यूँ छुड़ा ली’
बस...
करता है बातें वह
पवन की ,वेग की
सृष्टि की ,समष्टि की
ज्ञान की,उड़ान की
सपनों की ,अपनों की
अपनी निष्पाप आँखों से
झाँककर मेरी आँखों में
झकझोर देता है मुझे
मेरी मुठ्ठी में अपनी
अंगुली
पकड़ाकर कहता है—
खड़े हो जाओ ,चलो
डरो नहीं ,
मैं तुम्हारे साथ हूँ |
(मनोज कुमार ,१९.५.१२
,लखनऊ)