मेरे गले लिपटकर मेरी नन्ही परी बोली
मेरे गले लिपट कर मेरी
नन्ही परी अश्लेषा बोली
“बाबा तुम कितने भोले हो”
तुम को ये भी नहीं पता है
चंदा क्यों घटता-बढ़ता है?
खेल रहा वह तारों के संग
आँख- मिचौली ,
परदे के पीछे छुपकर
देखा करता है
कौन कहाँ है ?
बाबा तुम्हें पता है सूरज
रोज शाम को
आखिर कहाँ चला जाता है?
उसकी माँ उसको ले जाकर
दूध पिलाकर उसे सुलाती
घर की सब बत्तियाँ बुझाती
इसीलिए हर शाम अँधेरा
हो जाता है.
बाबा तुम कितने भोले हो
जाने क्या करते रहते हो
तुमको ये भी नहीं पता है
मुझको तो ये सारी बातें
मेरी मम्मा बतलाती है
तुम भी मम्मा संग रहो
तो सारी बातें
तुम्हें तुम्हारी मम्मा
अपने आप बताती .
बाबा तुम्हें पता है
बादल क्यों उड़ जाते
ये मेरी मौसी ‘बनफुल्ली’
बाहर पंखा बड़ा लगाकर
उन्हें भगाती
कहती है मुझसे
कपड़े कैसे सूखेंगे ?
मेरी नन्ही परी अश्लेषा
मेरे गले लिपटकर बोली
“बाबा तुम बिल्कुल भोले हो”.
मनोज कुमार ----२१.०८.२०१४ (लखनऊ )

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