HUM LOG U.P.
Sunday, 27 December 2015
नया खेल
सोनी आओ मोनी आओ , संता , बंता , गोनी आओ
जोजेफ और ज़ुलेखा आओ ,मिर्ज़ा और मुनव्वर आओ
आओ खेल नया रच डालें, दुनिया को व्यापार बना लें
क्या रोटी क्या दाना- पानी, नयी पैंट या कोट पुरानी
मिलजुल कर हर चीज़ बेच लें, कच्छा फटी कमीज बेच लें
होटल और दुकान बेच लें, बेचें खेत मकान बेच लें
धर्म बेच लें कर्म बेच लें, मानवता का मर्म बेच लें
आओ पूरा शहर बेच लें,मिलजुल कर यह डगर बेच लें
नदियाँ बेचें सागर बेचें, मिल जाये तो गागर बेचें
गांव-गांव हर खेत बेच लें, कोयला बेचें रेत बेच लें
चोरी-चोरी गैस बेच लें, चुपके से पेट्रोल बेच लें
गेहूँ बेचें चावल बेचें , चल धन्नो की पायल बेचें
बेचें नियम कानून बेच लें, बनकर अफलातून बेच लें
न्यायालय का नाम बेच लें, हाथों-हाथ विधान बेच लें
सोनी तुम मंत्री बन जाओ, डट कर खूब कमीशन खाओ
विधियों की धज्जियाँ उड़ाओ,जो मिल जाये वो सब खाओ
चारा खाओ लोहा बेचो , रांची और अमरोहा बेचो
दिल्ली खाओ पटना बेचो, ऐजावल
और सतना बेचो
केरल राजस्थान बेच लें, मिलकर हिंदुस्तान बेच लें
आओ खेल नया रच डालें दुनिया को व्यापार बना लें
भाषा और भदेस बेच लें मिलजुलकर
यह देश बेच लें .
-------- 27.12.2015----------
Tuesday, 22 December 2015
समझो कि नहीं होते सभी न्याय-प्रिय
नहीं होते सभी सत्यकाम
पर याद रखो--
हर आततायी को परास्त करता है
एक धैर्यवान .
स्वार्थी लोगों से अधिक हैं
निःस्वार्थ जननायक ,
अधिक हैं शत्रुओं से मित्र.
कठिन है समझना लेकिन
परिश्रम की सूखी रोटी
पकवानों से होती है अधिक
स्वादिष्ट .
सीखो -
हार में आत्मविश्वास ,
विजय में गरिमा .
बचो, ईर्ष्या से
सीखो -एकांत में मुस्कुराना
जानो कि सबसे सरल है
अत्याचारी को हराना .
ग्रहण करो पुस्तकों से ज्ञान
आत्मसात करो
प्रकृति का सौंदर्य और सत्य.
भूलो मत
छलपूर्वक सफल होने से श्रेष्ठ है
असफल हो जाना.
आस्था रखो
अपने आदर्शों पर
कोई कितना भी करे विरोध .
रहो सज्जनों से विनम्र
दुष्टों से कठोर
स्वयं पर रखो विश्वास
सुनो....
सत्य की कसौटी पर परखो हर विचार .
सीखो कठिनाईयों में हँसना
दुःख को आँसू में बहाना
संदेह पर मुस्कुराना
मीठी बातों से बचना .
लो अपने परिश्रम का मोल
रखो अपना विवेक
अपनी संवेदना अमोल .
सत्य के मार्ग पर चलते हुये
सीखो विरोध को नकारना
उससे जूझना .
मत मांगो कृपा
रखो विश्वास स्वयं पर
याद रखो
तपकर बनता है सोना कुंदन .
अंकुरित करो हृदय में
अधीर होने का साहस
वीर का धैर्य .
------२३.१२.२०१५ -------
नहीं होते सभी सत्यकाम
पर याद रखो--
हर आततायी को परास्त करता है
एक धैर्यवान .
स्वार्थी लोगों से अधिक हैं
निःस्वार्थ जननायक ,
अधिक हैं शत्रुओं से मित्र.
कठिन है समझना लेकिन
परिश्रम की सूखी रोटी
पकवानों से होती है अधिक
स्वादिष्ट .
सीखो -
हार में आत्मविश्वास ,
विजय में गरिमा .
बचो, ईर्ष्या से
सीखो -एकांत में मुस्कुराना
जानो कि सबसे सरल है
अत्याचारी को हराना .
ग्रहण करो पुस्तकों से ज्ञान
आत्मसात करो
प्रकृति का सौंदर्य और सत्य.
भूलो मत
छलपूर्वक सफल होने से श्रेष्ठ है
असफल हो जाना.
आस्था रखो
अपने आदर्शों पर
कोई कितना भी करे विरोध .
रहो सज्जनों से विनम्र
दुष्टों से कठोर
स्वयं पर रखो विश्वास
सुनो....
सत्य की कसौटी पर परखो हर विचार .
सीखो कठिनाईयों में हँसना
दुःख को आँसू में बहाना
संदेह पर मुस्कुराना
मीठी बातों से बचना .
लो अपने परिश्रम का मोल
रखो अपना विवेक
अपनी संवेदना अमोल .
सत्य के मार्ग पर चलते हुये
सीखो विरोध को नकारना
उससे जूझना .
मत मांगो कृपा
रखो विश्वास स्वयं पर
याद रखो
तपकर बनता है सोना कुंदन .
अंकुरित करो हृदय में
अधीर होने का साहस
वीर का धैर्य .
------२३.१२.२०१५ -------
Wednesday, 29 April 2015
शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ
ग़ैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
झिलमिलाते कुमकुमों की, राह में ज़ंजीर सी
रात के हाथों में, दिन की मोहिनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर, चलती हुई शमशीर सी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
फिर वो टूटा एक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में, आई ये मोती की लड़ी
हूक सी सीने में उठी, चोट सी दिल पर पड़ी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
रात हँस – हँस कर ये कहती है, कि मयखाने में चल
फिर किसी शहनाज़-ए-लालारुख के, काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर, ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
हर तरफ़ बिखरी हुई, रंगीनियाँ रानाइयाँ
हर क़दम पर इशरतें, लेती हुई अंगड़ाइयां
बढ़ रही हैं गोद फैलाये हुये रुस्वाइयाँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये, ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
मुंतज़िर है एक, तूफ़ान-ए-बला मेरे लिये
अब भी जाने कितने, दरवाज़े है वहां मेरे लिये
पर मुसीबत है मेरा, अहद-ए-वफ़ा मेरे लिए
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
जी में आता है कि अब, अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूँ
उनको पा सकता हूँ मैं ये, आसरा भी छोड़ दूँ
हाँ मुनासिब है ये, ज़ंजीर-ए-हवा भी तोड़ दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
एक महल की आड़ से, निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा, जैसे बनिये की किताब
जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
दिल में एक शोला भड़क उठा है, आख़िर क्या करूँ
मेरा पैमाना छलक उठा है, आख़िर क्या करूँ
ज़ख्म सीने का महक उठा है, आख़िर क्या करूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर, हैं नज़र के सामने
सैकड़ों चंगेज़-ओ-नादिर, हैं नज़र के सामने
सैकड़ों सुल्तान-ओ-ज़बर, हैं नज़र के सामने
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
ले के एक चंगेज़ के, हाथों से खंज़र तोड़ दूँ
ताज पर उसके दमकता, है जो पत्थर तोड़ दूँ
कोई तोड़े या न तोड़े, मैं ही बढ़कर तोड़ दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
बढ़ के इस इंदर-सभा का, साज़-ओ-सामाँ फूँक दूँ
इस का गुलशन फूँक दूँ, उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
तख्त-ए-सुल्ताँ क्या, मैं सारा क़स्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
जी में आता है, ये मुर्दा चाँद-तारे नोंच लूँ
इस किनारे नोंच लूँ, और उस किनारे नोंच लूँ
एक दो का ज़िक्र क्या, सारे के सारे नोंच लूँ
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ
ग़ैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
झिलमिलाते कुमकुमों की, राह में ज़ंजीर सी
रात के हाथों में, दिन की मोहिनी तस्वीर सी
मेरे सीने पर मगर, चलती हुई शमशीर सी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
फिर वो टूटा एक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी
जाने किसकी गोद में, आई ये मोती की लड़ी
हूक सी सीने में उठी, चोट सी दिल पर पड़ी
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
रात हँस – हँस कर ये कहती है, कि मयखाने में चल
फिर किसी शहनाज़-ए-लालारुख के, काशाने में चल
ये नहीं मुमकिन तो फिर, ऐ दोस्त वीराने में चल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
हर तरफ़ बिखरी हुई, रंगीनियाँ रानाइयाँ
हर क़दम पर इशरतें, लेती हुई अंगड़ाइयां
बढ़ रही हैं गोद फैलाये हुये रुस्वाइयाँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये, ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
मुंतज़िर है एक, तूफ़ान-ए-बला मेरे लिये
अब भी जाने कितने, दरवाज़े है वहां मेरे लिये
पर मुसीबत है मेरा, अहद-ए-वफ़ा मेरे लिए
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
जी में आता है कि अब, अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूँ
उनको पा सकता हूँ मैं ये, आसरा भी छोड़ दूँ
हाँ मुनासिब है ये, ज़ंजीर-ए-हवा भी तोड़ दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
एक महल की आड़ से, निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा, जैसे बनिये की किताब
जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
दिल में एक शोला भड़क उठा है, आख़िर क्या करूँ
मेरा पैमाना छलक उठा है, आख़िर क्या करूँ
ज़ख्म सीने का महक उठा है, आख़िर क्या करूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर, हैं नज़र के सामने
सैकड़ों चंगेज़-ओ-नादिर, हैं नज़र के सामने
सैकड़ों सुल्तान-ओ-ज़बर, हैं नज़र के सामने
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
ले के एक चंगेज़ के, हाथों से खंज़र तोड़ दूँ
ताज पर उसके दमकता, है जो पत्थर तोड़ दूँ
कोई तोड़े या न तोड़े, मैं ही बढ़कर तोड़ दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
बढ़ के इस इंदर-सभा का, साज़-ओ-सामाँ फूँक दूँ
इस का गुलशन फूँक दूँ, उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
तख्त-ए-सुल्ताँ क्या, मैं सारा क़स्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
जी में आता है, ये मुर्दा चाँद-तारे नोंच लूँ
इस किनारे नोंच लूँ, और उस किनारे नोंच लूँ
एक दो का ज़िक्र क्या, सारे के सारे नोंच लूँ
ऐ गम-ऐ-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ऐ-दिल क्या करूँ .
----मजाज लखनवी ---
Monday, 12 January 2015
यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है।
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है।
देश कागज पर बना
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियां, पर्वत, शहर, गांव
वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें
अनमने रहें।
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे तुम्हारे साथ
नहीं रहना है।
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियां, पर्वत, शहर, गांव
वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें
अनमने रहें।
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे तुम्हारे साथ
नहीं रहना है।
इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा
कुछ भी नहीं है
न ईश्वर
न ज्ञान
न चुनाव
कागज पर लिखी कोई भी इबारत
फाड़ी जा सकती है
और जमीन की सात परतों के भीतर
गाड़ी जा सकती है।
कुछ भी नहीं है
न ईश्वर
न ज्ञान
न चुनाव
कागज पर लिखी कोई भी इबारत
फाड़ी जा सकती है
और जमीन की सात परतों के भीतर
गाड़ी जा सकती है।
जो विवेक
खड़ा हो लाशों को टेक
वह अंधा है
जो शासन
चल रहा हो बंदूक की नली से
हत्यारों का धंधा है
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे
अब एक क्षण भी
तुम्हें नहीं सहना है।
खड़ा हो लाशों को टेक
वह अंधा है
जो शासन
चल रहा हो बंदूक की नली से
हत्यारों का धंधा है
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे
अब एक क्षण भी
तुम्हें नहीं सहना है।
याद रखो
एक बच्चे की हत्या
एक औरत की मौत
एक आदमी का
गोलियों से चिथड़ा तन
किसी शासन का ही नहीं
सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन।
एक बच्चे की हत्या
एक औरत की मौत
एक आदमी का
गोलियों से चिथड़ा तन
किसी शासन का ही नहीं
सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन।
ऐसा खून बहकर
धरती में जज्ब नहीं होता
आकाश में फहराते झंडों को
काला करता है।
जिस धरती पर
फौजी बूटों के निशान हों
और उन पर
लाशें गिर रही हों
वह धरती
यदि तुम्हारे खून में
आग बन कर नहीं दौड़ती
तो समझ लो
तुम बंजर हो गये हो-
तुम्हें यहां सांस लेने तक का नहीं है अधिकार
तुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार।
धरती में जज्ब नहीं होता
आकाश में फहराते झंडों को
काला करता है।
जिस धरती पर
फौजी बूटों के निशान हों
और उन पर
लाशें गिर रही हों
वह धरती
यदि तुम्हारे खून में
आग बन कर नहीं दौड़ती
तो समझ लो
तुम बंजर हो गये हो-
तुम्हें यहां सांस लेने तक का नहीं है अधिकार
तुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार।
आखिरी बात
बिल्कुल साफ
किसी हत्यारे को
कभी मत करो माफ
चाहे हो वह तुम्हारा यार
धर्म का ठेकेदार,
चाहे लोकतंत्र का
स्वनामधन्य पहरेदार।
बिल्कुल साफ
किसी हत्यारे को
कभी मत करो माफ
चाहे हो वह तुम्हारा यार
धर्म का ठेकेदार,
चाहे लोकतंत्र का
स्वनामधन्य पहरेदार।
----सर्वेश्वर दयाल सक्सेना -----
पंखी राजा रे पंखी
राजा मीठा बोल
जोत जगी हर मन में
भँवरा गूँजा, डाली झूमे
बस्ती, बाड़ी, बन में
जोत जगी हर मन में
नदिया रानी रे
नदिया रानी मीठा बोल
मीठा बोल
घाट लगी हर नाव
रात गई सुख जागा
पायल बाँधो, नाचो, गाओ
घाट लगी हर नाव
नदिया रानी मीठा बोल
सुन्दर गोरी रे
सुन्दर गोरी मीठा बोल
जीवे रूप जवानी
बात करे तो फूल खिलें
अँखियाँ एक कहानी
जैसे दूर से तारा चमके
चमके रूप जवानी
जीवे रूप जवानी
जोत जगी हर मन में
पंखी राजा मीठा बोल
नदिया रानी मीठा बोल
सुन्दर गोरी मीठा बोल
---फैज़ अहमद फैज़ ----
राजा मीठा बोल
जोत जगी हर मन में
भँवरा गूँजा, डाली झूमे
बस्ती, बाड़ी, बन में
जोत जगी हर मन में
नदिया रानी रे
नदिया रानी मीठा बोल
मीठा बोल
घाट लगी हर नाव
रात गई सुख जागा
पायल बाँधो, नाचो, गाओ
घाट लगी हर नाव
नदिया रानी मीठा बोल
सुन्दर गोरी रे
सुन्दर गोरी मीठा बोल
जीवे रूप जवानी
बात करे तो फूल खिलें
अँखियाँ एक कहानी
जैसे दूर से तारा चमके
चमके रूप जवानी
जीवे रूप जवानी
जोत जगी हर मन में
पंखी राजा मीठा बोल
नदिया रानी मीठा बोल
सुन्दर गोरी मीठा बोल
---फैज़ अहमद फैज़ ----
Monday, 29 September 2014
बिना बताये पूछे मुझसे कहाँ चले जाते हो --
बिना बताये , पूछे मुझसे , कहाँ चले जाते हो बाबा
कितना डर जाती हूँ तुमको समझ
नहीं आता बाबा
वह जो काला कुत्ता बाहर बैठा रहता है
अक्सर दौड़ाकर लोगों को काटा करता है
परसों उसने मम्मा को भी खूब छकाया था
मैंने ही तब शोर मचा कर उसे भगाया था
सोचो वो जब तुम्हें काटने को दौड़ायेगा
दौड़ नहीं पाते हो तुमको कौन बचायेगा .
बिना बताये -----
कितना डर ------
दादी कहती है जामुन पर कागा रहता है
शाम ढले वह भी लोगों को काटा करता है
मेरे हाथों से भी रोटी छीन ले गया था
म्याऊं उस पर झपटी पर वह दूर उड़ गया था
सिर के ऊपर उड़कर जब वह तुम्हें सताएगा
भाग नहीं पाते हो तुम को कौन बचायेगा .
बिना बताये ------
कितना डर--------
बिना बताये पूछे मुझसे कहीं नहीं जाना बाबा
हाँ मैं कह देती हूँ झूठी कसम नहीं खाना बाबा.
तुम्हें कहीं भी चलना हो तोमैं भी साथ चलूंगी
शाशा, डोरेमान,टार्ज़न सब को संग रखुंगी
समझेंगे सब अपनी भी पूरी तय्यारी है
बाबा बोले “बेटू तुझ पर सब बलिहारी है
बिना बताये पूछे तुझसे कहीं नहीं जाऊँगा
खाता हूँ मैं कसम कभी भी कसम नहीं खाऊंगा.”
-----मनोज कुमार ----२८.९.२०१४
बाबा मुझको पंख लगा दो
बाबा मुझको पंख लगा दो .
सुबह सवेरे चिड़िया रानी
लेने आती दाना-पानी
फुदक-फुदक कर खूब नहाती
मेरा डाला दाना खाती
फूलों से सब रस पी जाती
जब मैं कहती मुझे ले चलो
अपने साथ, फुर्र उड़ जाती
ऊँची डाली बैठ चिढ़ाती
पूंछ हिलाती ,पंख नचाती
मुझको साथ नहीं ले जाती
बाबा मैं कागज लायी हूँ
कैंची और गोंद लायी हूँ
सुंदर-सुंदर पंख बना दो
अच्छे से उनको चिपका दो
मेरी पीठ पाँव हाथों पर
उन्हें बांधकर टेप लगा दो
हरियल से ऊपर उड़ जाऊं
इधर उधर उड़ उसे चिढ़ाऊं
पत्तों में छुपकर मैं बैठूं
वो आये तो उसे डराऊं .
बाबा तुम मुझ पर हंसते हो
मेरा कहा नहीं करते हो
चूं-चूं से मिल मुझे सताते
हो उसके संगी बन जाते
बाबा मैं अपने पंखों से
बहुत दूर तक उड़ जाऊँगी
क्या कर लोगे बोलो जब मैं
पास तुम्हारे नहीं आउंगी .
-----मनोज कुमार --------
२५.९.२०१४
