कल भी
कल भी
कल फिर
कलियों के अधर छूकर
आएगी सुबह
शतदल कमल पर फिर उडेंगे
भ्रमर
कल भी .
पर नहीं होगी तुम
रूप की परिभाषा सी
नैनों के परस से
मुरझाई लजवंती .
नहीं हूँगा मैं
निष्ठा के सागर सा
अंतस के अधरों का अनकहा गीत
.
छौना सा मन नहीं भटकेगा
मरीचिका में और ( और )
टूट जाएगा .
पर रजनीगन्धा का चिबुक छूकर
विधु मुस्कुराएगा यूँ ही
कल भी ......
बेला के अधरों पर आंक देगा
पवन
एक चुम्बन और . ( १९६९ ,यमुना नगर )

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home