Tuesday, 24 April 2012

कल भी


कल भी

कल फिर

कलियों के अधर छूकर

आएगी सुबह

शतदल कमल पर फिर उडेंगे भ्रमर

कल भी .



पर नहीं होगी तुम

रूप की  परिभाषा सी

नैनों के परस से मुरझाई  लजवंती .

नहीं हूँगा मैं

निष्ठा के सागर सा

अंतस के अधरों का अनकहा गीत .

 छौना सा मन नहीं भटकेगा

मरीचिका में और ( और )

टूट जाएगा .

पर रजनीगन्धा का चिबुक छूकर

विधु मुस्कुराएगा यूँ ही

कल भी ......

बेला के अधरों पर आंक देगा पवन

एक चुम्बन और .    ( १९६९ ,यमुना नगर )


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